शिकायतकर्ता की सहमति के बिना नाम, मोबाइल नंबर और ई-मेल आईडी का इस्तेमाल कर को-प्रमोटर दर्शाने का आरोप; Trisol Red Developer LLP और पवन कुमार शर्मा के खिलाफ मामला दर्ज
GBN एक्स्प्रेस न्यूज देवेंद्र सिंह भाटी
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गाजियाबाद। जमीन के एग्रीमेंट और रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में को-प्रमोटर बनाए जाने को लेकर गाजियाबाद में विवाद सामने आया है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि उसकी जानकारी और सहमति के बिना उसके नाम, मोबाइल नंबर और ई-मेल आईडी का इस्तेमाल कर उसे TRG THE MALL प्रोजेक्ट में को-प्रमोटर के रूप में दर्शाया गया। मामले में धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक षड्यंत्र से संबंधित धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कराई गई है।
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किसानों के अधिवक्ता प्रशांत चौधरी ने बताया कि शिकायत के अनुसार, 5 जनवरी 2024 को जमीन बेचने के संबंध में एक एग्रीमेंट किया गया था, जो लिखित रूप से 24 महीने के लिए वैध था। आरोप है कि एग्रीमेंट की शर्तों से अलग जाकर शिकायतकर्ता की व्यक्तिगत जानकारी का इस्तेमाल किया गया और कथित तौर पर ऐसे दस्तावेज तैयार किए गए, जिनके आधार पर उसे प्रोजेक्ट में को-प्रमोटर के रूप में दर्शाया गया।
क्रॉसिंग रिपब्लिक थाने में दर्ज हुई FIR
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, इस मामले में गाजियाबाद के क्रॉसिंग रिपब्लिक थाने में 27 सितंबर 2026 को एफआईआर संख्या 0228/2026 दर्ज की गई। प्राथमिकी में Trisol Red Developer LLP और पवन कुमार शर्मा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 318(4), 336(4), 352 और 351(3) के तहत मामला दर्ज किया गया है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि उसकी सहमति के बिना उसके नाम और संपर्क संबंधी विवरणों का इस्तेमाल कर उसे परियोजना से जोड़ने की कोशिश की गई। शिकायत में कथित दस्तावेजों की जांच कर उनकी वास्तविकता और जिम्मेदार लोगों की भूमिका स्पष्ट करने की मांग की गई है।
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निष्पक्ष जांच और कानूनी कार्रवाई की मांग
अधिवक्ता प्रशांत चौधरी के मुताबिक, शिकायतकर्ता ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने और दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की मांग की है। विवाद का प्रमुख बिंदु यह है कि जमीन के एग्रीमेंट की शर्तों और रियल एस्टेट परियोजना में शिकायतकर्ता को को-प्रमोटर के रूप में दर्शाए जाने के बीच क्या संबंध है तथा क्या इसके लिए उसकी सहमति ली गई थी।
फिलहाल, मामले में लगाए गए आरोपों की पुष्टि जांच और संबंधित दस्तावेजों के परीक्षण से होगी। प्राथमिकी दर्ज होना आरोपों का अंतिम प्रमाण नहीं है।


