मंझावली-जगनपुर अफजलपुर लिंक रोड को लेकर किसानों की याचिका में हाईकोर्ट के आदेश का हवाला, जमीन मालिकों की सहमति और उचित मुआवजे की मांग
भूमि रिकॉर्ड की विसंगतियां दूर करने, सह-मालिकों के नाम दर्ज करने और सहमति न बनने पर 2013 के कानून के तहत प्रक्रिया अपनाने की मांग
ग्रेटर नोएडा। गौतमबुद्ध नगर के जगनपुर-अफजलपुर गांव के किसानों की भूमि से संबंधित प्रस्तावित मंझावली (हरियाणा)-जगनपुर अफजलपुर (उत्तर प्रदेश) लिंक रोड परियोजना को लेकर भूमि मालिकों ने मुआवजे, भूमि रिकॉर्ड और जमीन खरीद की प्रक्रिया पर गंभीर आपत्तियां उठाई हैं। किसानों की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि परियोजना से प्रभावित भूमि के सर्वेक्षण में सभी सह-मालिकों के नाम और हिस्सेदारी सही तरीके से दर्ज नहीं की गई है।
याचिका के अनुसार, संबंधित भूमि यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (YEIDA) तथा प्रस्तावित लिंक रोड परियोजना के नोटिफाइड क्षेत्र में आती है। प्रस्तावित सड़क से याचिकाकर्ता और उनके परिवार की कई जमीनें प्रभावित हो रही हैं।
गाटा नंबरों के सर्वे में विसंगतियों का आरोप
याचिकाकर्ता ने गाटा संख्या 256, 235(बी), 234 और 236(बी) के संबंध में किए गए PWD सर्वे पर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि सर्वे में सभी सह-मालिकों के नाम एवं हिस्से सही तरीके से दर्ज नहीं किए गए हैं। विशेष रूप से मौजूदा खतौनी में दर्ज श्रीमती धर्मावती और सुश्री राजबाला के नाम एवं हिस्सेदारी को लेकर सुधार की मांग की गई है।
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किसानों का कहना है कि भूमि रिकॉर्ड में सही स्वामित्व और हिस्सेदारी दर्ज किए बिना भूमि खरीद अथवा आगे की कार्रवाई करने से संबंधित भूमि मालिकों के हित प्रभावित हो सकते हैं।
मुआवजे की दर में समानता की मांग
याचिका में मुआवजे की दर को लेकर भी आपत्ति दर्ज कराई गई है। याचिकाकर्ता के अनुसार, इसी क्षेत्र में YEIDA/जेवर एयरपोर्ट से संबंधित भूमि के लिए करीब ₹4,300 प्रति वर्ग मीटर की दर का उल्लेख किया गया है, जबकि लिंक रोड परियोजना के लिए लगभग ₹3,720 प्रति वर्ग मीटर की पुरानी दर लागू किए जाने की बात सामने आई है।
याचिकाकर्ता ने 23 फरवरी 2016 की नीति का हवाला देते हुए कहा है कि परियोजना में देरी होने अथवा सेल डीड से पहले सर्किल रेट या संबंधित नीति में बदलाव होने की स्थिति में लागू मानकों के अनुसार दरों का पुनर्निर्धारण किया जाना चाहिए।
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बिना सहमति जमीन खरीद पर उठाया सवाल
याचिका में कहा गया है कि याचिकाकर्ता और उनके परिवार की ओर से भूमि की सीधी खरीद के लिए कोई लिखित सहमति नहीं दी गई है। याचिकाकर्ता ने 2015 की नीति का हवाला देते हुए सभी सह-मालिकों की स्वैच्छिक लिखित सहमति को आवश्यक बताया है।
इसी संदर्भ में किसानों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ के उस आदेश का भी हवाला दिया है, जिसमें सड़क चौड़ीकरण के लिए निजी जमीन लेने के मामले में कहा गया कि सहमति से भूमि खरीद की स्थिति में भूमि मालिक की स्वेच्छा और तय कीमत पर सहमति जरूरी है। सहमति नहीं बनने पर कानून के तहत अधिग्रहण की प्रक्रिया अपनानी होगी।
16 मार्च को जिलाधिकारी को सौंपा था प्रतिवेदन
याचिकाकर्ता के अनुसार, उन्होंने 16 मार्च 2026 को जिला मजिस्ट्रेट को विस्तृत प्रतिवेदन सौंपकर सर्वेक्षण में कथित त्रुटियों को दूर करने, सभी सह-मालिकों के नाम एवं हिस्सेदारी सही दर्ज करने तथा मुआवजे की दर में समानता सुनिश्चित करने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता का दावा है कि प्रतिवेदन प्राप्त होने के बावजूद भूमि रिकॉर्ड में अपेक्षित सुधार और दरों के पुनर्निर्धारण की कार्रवाई नहीं हुई तथा परियोजना से संबंधित प्रक्रिया आगे बढ़ाने का प्रयास जारी है।
किसानों ने मांग की है कि पहले भूमि रिकॉर्ड की सभी विसंगतियों को दूर किया जाए, सभी वास्तविक सह-मालिकों के अधिकारों को रिकॉर्ड में स्पष्ट किया जाए और मुआवजे की दर का निर्धारण लागू नीति एवं वर्तमान मानकों के अनुरूप किया जाए। साथ ही, यदि भूमि मालिकों और प्रशासन के बीच स्वैच्छिक सहमति नहीं बनती है तो भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम, 2013 के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया अपनाई जाए।
नोट: मुआवजे की दर, भूमि रिकॉर्ड में कथित विसंगतियों, नीतियों की व्याख्या और प्रशासनिक कार्रवाई से संबंधित बातें याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत दावों/आपत्तियों पर आधारित हैं। इन्हें न्यायालय द्वारा अंतिम रूप से तय तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है।


